बेख़याली-ए-मोहब्बत। (Part-1)

थक गया था लोगों की परवाह कर करके।
बडा शुकून सा है, जब से लापरवाह हुआ हूँ।

कमबख़्त मलाल इस बात का रह गया।
लापरवाही का क्रेडिट मिला भी तो किसको।

ताज़्जुब तो देखिये, सब्र इस बात का है।
तुझसे छीनने की औकात भी नहीं है किसी और की।

सच पूँछिये तो, मसला-ए-दर्द इस बात का है।
ये तोहफ़ा दिया भी तूने, लिया छीन भी तूने ही।

चंद-ए-रोज़ जिये, जिस चैन-ए-मोह्ब्बत में।
पूँछता हूँ, क्यूँ छीन लिए वो लम्हें प्यार के।

मसलन, दवा-ए-मर्ज़ मैं शराब में नहीं, अपने काम में ढूंढता हूँ।
शिकायत ये है, काम शुकून तो देता है, लेकिन पहले जैसा जुनूँ नहीं।

कितनी बचकानी सी है हरक़त, दूर तुमसे जाने की कोशिश मेरी।
करके कोशिश मैं तुमसे दूर जाने की, खोजता फिर भी सिर्फ तुम्हें ही हूँ।

मज़ा-ए-लफ़्ज़ों लताफ़त ये है मोहतरमा।
हमें इश्क़ पसंद है, इश्क़ से ज़्यादा तुम।

बेख़याली-ए-मोहब्बत कितनी प्यारी और जानलेवा है।
कमबख़्त कोई हम से पूँछे।

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