चलो गांवों की ओर !!!
दिल्ली छोड़ो, मुंबई छोड़ो, चलो गाँव की ओर ।
महानगरों-नगरों को छोड़ो, चलो प्रकृति की ओर ।।
फाइव स्टार छोड़ो, एसी-वीसी छोड़ो, अब चलो गाँव की ओर ।
भीड़-भाड़ से हटकर अब बढ़ो सुकून की ओर ।।
पर, ध्यान रहे वहां के प्राकृतिक संसाधनों, पर्यावरण, वातावरण और संस्कृति से छेड़छाड़ नहीं, नहीं तो तुम शहर और प्रकृति के आँगन (गाँव) का अंतर कैसे समझ पाओगे और वहां की सौम्य जिन्दगी का आनंद कैसे अनुभव कर पाओगे ।

बड़ा भोला बड़ा सादा बड़ा सच्चा है।
तेरे शहर से तो मेरा गाँव अच्छा है॥
वहां मैं मेरे बाप के नाम से जाना जाता हूँ।
और यहाँ मकान नंबर से पहचाना जाता हूँ॥
वहां फटे कपड़ो में भी तन को ढापा जाता है।
यहाँ खुले बदन पे टैटू छापा जाता है॥
यहाँ कोठी है बंगले है और कार है।
वहां परिवार है और संस्कार है॥
यहाँ चीखो की आवाजे दीवारों से टकराती है।
वहां दुसरो की सिसकिया भी सुनी जाती है॥
यहाँ शोर शराबे में मैं कही खो जाता हूँ।
वहां टूटी खटिया पर भी आराम से सो जाता हूँ॥
यहाँ रात को बहार निकलने में दहशत है...
मत समझो कम हमें की हम गाँव से आये है।
तेरे शहर के बाज़ार मेरे गाँव ने ही सजाये है॥
वह इज्जत में सर सूरज की तरह ढलते है।
चल आज हम उसी गाँव में चलते हैं ।।
...उसी गाँव में चलते हैं ।
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